ग़ौर से
एक मतला तीन शेर---
उसने कल चेहरे को देखा गौर से,
मुझको हैरत सी हुई इस तौर से,
रुख़ पै माज़ी की लिखी है हर लकीर,
वक़्त ये गुज़रा है जिस-जिस दौर से,
उसको अपना जानके बांटा था ग़म,
कौन कहता है वगरना और से,
इससे पहले ये हिले बुनियाद भी,
तर्क करना है त-आल्लुक ठौर से...
#उर्मिलामाधव...
23.8.2015...
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