बहला करूँ

किसलिए जज़्बात का सौदा करूँ,
झूठ से भी कब तलक बहला करूँ,

जो मेरी बुनियाद का हिस्सा नही,
उसपे नीयत किस लिए ज़ाया करूँ,
 
यूँ भी तो तनहा है हर इक आदमी,
बे-सबब ही इतना क्यूँ सोचा करूँ,

कौन किसका हो सका है उम्र भर,
कौन से हक से भला दावा करूँ,

कोई भी हो,गम ही दे कर जाएगा,
जानके ग़म किसलिए चस्पां करूँ  

जब अनल हक़ पै टिकी है ज़िन्दगी,
दर-ब-दर फिर किसलिए घूमा करूँ.... 
उर्मिला माधव ....
28.8.2017

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