शाम का अक्स ज़िंदगानी है
लगता रहता है, सुब्ह आनी है

आदमी सिर्फ़ इक मुसाफ़िर है
एक इक सांस इसमें फ़ानी है

कोई मंज़िल नज़र नहीं आती,
फिर भी इक राह तो बनानी है

कितना मरने प हम हैं आमादा,
अपनी शिद्दत भी आज़मानी है

अपने हाथों लहद सजानी है

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