दिया बढ़ा दे

दिया बढ़ा दे,
सोना है,
जलने दो माँ,
अंधेरा अच्छा नहीं लगता,
तेल बढ़ा दूँ क्या ?
जलता रहेगा,
अंधेरे की आख़री सांस तक,
और तूफ़ान,
बरसाती हवाएं
धोबी की टीन की छत
उस पर पानी के
गिरने की आवाज़ें,
नीरवता को बेधती हुई,
लड़खड़ाती, दिए की लौ,
घबराता हुआ मन,
कुत्तों का रोना,
अजीब जंगल है,
यहां हलवाई की
भट्टियां नहीं जलतीं,
यहां जलते हैं मुर्दे,
भीग जाती है राख,
कुत्तों का गर्म बिछौना,
चिता की सुगबुगाती आग,
ठंडी होती हुई,
अंततः, भीगती हुई,
विलाप करते हुए,
ठंड से कांपते हुए
कुत्ते और
मौसम है कि सुहाना
होना ही चाहे,
दो रंगी दुनियां
या
बदरंगी दुनियां ?
तय कौन करे,
कौन कर पाया !!
उर्मिला माधव,
28.8.2018

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