ठिकाने घर के

ये कोई जिस्म हुआ...ज़ख़्म ज़माने भर के,
चार क़दमों ही पे याद आएं ,ठिकाने घर के..

क्या मिलें उनसे न अख़लाक़-ए-मुहब्बत न लिहाज़,
जिन के होठों पे महज़, प्यार दिखाने भर के,
उर्मिला माधव ..
15.1.2018

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