किला सा है
ये जो यादों का सिलसिला सा है,
बे-वज्ह रेत का क़िला सा है ,
मैंने ग़म पहली बार ही देखा,
फिर भी ये क्यूँ लगा मिला सा है,
ज़ख्म पैवंद जैसा लगता है,
ज़ीस्त के तार से सिला सा है,
रात को घर जो ख्वाब में देखा,
अपनी बुनियाद में हिला सा है,
किसको फुर्सत है कौन देखेगा ??
हर कोई ख़ुद में मुब्तिला सा है
ज़र्फ़-ए-इंसां के कुछ कहाँ मानी,
ख़ुद-ब-ख़ुद आप में गिला सा है,
उर्मिला माधव...
20.5.2014...
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