नज़्म
एक नज़्म... (पुराने पन्नों से)
आदमी कुछ अजीब लगता था,
ज़िंदगी सा करीब लगता था,
उन दिनों दिल का एक आलम था,
मुश्किलों का असर ज़रा कम था ,
उसको देखे से चैन मिलता था,
बस खुदा से वो ऐन मिलता था,
अपनी दुनियाँ,बहार होती थी,
आँख जब उससे चार होती थी
उसने अपना चलन बदल डाला,
मेरे दिल का चमन कुचल डाला,
बाद उसके तो फिर ये होना था,
अपने दामन को ही भिगोना था,
यूँ सहर अब भी रोज़ होती है,
उसकी आमद से खूब रोती है,
दिल की कूव्वत जवाब देती है,
उम्र भर का हिसाब लेती है...
उर्मिला माधव...
7.11.2014...
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