एक मतला दो शेर

एक मतला --दो शेर...
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जिन दरख्तों की जड़ें,गहरी रही हैं,
आँधियों के बाद भी....ठहरी रही हैं,

शोर करतीं बिजलियाँ हैं जो उफ़क पर,
ख़ुद शजर के साए में बहरी रही हैं,

सब्ज़ दुनियाँ में ठुमक जाती हैं अक्सर,
जो हवाएं अब तलक शहरी रही हैं....
उर्मिला माधव...
23.3.2016

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