अब कलम से आग लगती ही कहां है
अब कलम से आग लगती ही कहाँ है,
आग का मक़सद तो हर इक आशियाँ है,
ज़िन्दगी ज़िंदादिली है, सच है क्या ये ?
कोई बतलाएगा इसमें क्या निहां है?
क्या कोई मज़हब अभी बाक़ी रहा है,
क्यों फ़ना होता है जो इक कारवां है?
वो भी राही क़त्ल कर डाले गए सब,
जिनकी पाकीज़ा ज़ुबाँ, अम्न-ओ-अमां है,
इसको किन नज़रों से देखा जाएगा अब?
ये जो मक़तल से गया गुज़रा समां है,
उर्मिला माधव,
Comments
Post a Comment