नज़्म चाय

आज फिर शाम हो गई तुम बिन,
आज फिर रोके उठ गई हूं मैं,
क्या करूँ काम ये भी बतला दो,
इस धुंधलके में कैसे चलना है,
ये भी अंदाज़ मुझको समझा दो,
सुब्ह जो रोज़ शाम जैसी है,
सुब्ह की शक़्ल कैसे पाएगी,
दिन भी धुंधला दिखाई देता है,
सुब्ह वो क्या कभी न आएगी ?
तुम भी जब साथ-साथ उठते थे,
कामिनी खिलखिला के हंसती थी,
खुशबुएँ,खिड़कियों से आती थीं,
पत्तियां फ़र्श पर बिखरती थीं,
और हर गुफ़्तगू,सिरे के बिना,
ख़त्म होकर भी जो न होती थी,
रोज़ तुम मुझको ये बताते थे,
चाय अच्छी नहीं सेहत के लिए,
मैं मगर मुस्कुरा के उस पल ही,
दूसरी चाय लेके आ जाती,
और तुम अपने काम करने को,
अपने कमरे को छोड़ जाते थे,
आज कमरा वहीं पे रहता है,
हां मगर मैं वहां नहीं रहती ....
उर्मिला माधव,
12.9.2017

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