Posts

Showing posts from September, 2025

तीरगी में चल चल रहे थे

तीरगी में चल रहे थे रौशनी बस दिल की थी आँधियों का सामना था,इक ख़ुशी मंजिल की थी  जब के मेरे दिल के टुकड़े चार सू बिखरे रहे, लोग ये कहते रहे ये चाल किस आदिल की थी उर्मिला माधव 

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा बिलकुल जुदा रख्खा गया, आदमी का आदमी से सिलसिला रख्खा गया, ज़िंदगी में इस तरह रंगीनियाँ रख्खी गईं, जिसमें इंसानों को हरदम मुब्तिला रख्खा गया, बुत बनाया पथ्थरों से और फिर दैर-ओ-हरम, सर-ब-सजदा होने को नाम-ए-ख़ुदा रख्खा गया, फिर अदालत भी बनी सब पर हुकूमत के लिए, पंडितों मुल्लाओं को तब नाख़ुदा रख्खा गया, ज़िन्दगी और मौत के जलवों से है ये क़ायनात, इन्तेहा का नाम तब फिर इब्तेदा रख्खा गया.... उर्मिला माधव...

क्यों करूं परवाह बोलो

मैं किसीकी क्यूँ करूँ परवाह, बोलो, एक तरफ़ा कब निभी है चाह, बोलो, जानिब-ए-मंजिल मुझे जाना ही होगा, ज़िन्दगी भर क्यूँ तकूँ अब राह, बोलो, ज़िन्दगी को दर्द-ए-गम का वास्ता दूँ ? क्या वो आइन्दा न देगी आह, बोलो, जो मिले सौगात दे बस आंसुओं की, ये कहो कब तक करूं मैं वाह, बोलो, ज़िन्दगी मेरी में रख्खूँ या न रख्खूँ इसके मिटने पै भी लूँ इस्लाह बोलो? उर्मिला माधव... 29.9.2014..

कांटों पे जुमला

लिखा हमने फूलों पे काँटों से जुमला, चुभन कैसी लगती है तुमको?बताना, जो लफ़्ज़ों से अब तक निकलती रही है, जलन कैसी लगती है तुमको??बताना , फिजाओं मैं उठता धुंआ भी तो होगा ?? घुटन कैसी लगती है तुमको?बताना , जो शम्मा अभी तक सिरहाने जली है, तपन कैसी लगती है तुमको??बताना जो छाले.......हजारों की तादाद मैं थे, सडन कैसी लगती है तुमको??बताना.... उर्मिला माधव... २८.९.२०१३

जज़्बात मेरे

उम्र भर को जुड़ गए हैं,आपसे जज़्बात मेरे. साथ बस देते नहीं हैं,आजकल हालात मेरे, ख़ुश्क आँखों का वो मंज़र देख कर ऐसा हुआ  अश्क़ लानत दे गए हैं क्या कहूँ कल रात मेरे, सोचती हूँ आख़िरश बाहर निकलकर क्या करूँ  दम-ब-दम जलती ज़मीं ऑ सर पै ये बरसात मेरे, दोनों हाथों से उठा कर फेंकती रहती हूँ बाहर, हो गई घर में ग़मों की रात-दिन इफरात मेरे,  भूल सी जाती हूँ मैं सब,मेरी दुनियां क्या हुई ? वहशतें सी कह रही हैं कान में कुछ बात मेरे... #उर्मिलामाधव, 8.9.2015..

ख़ून के रिश्ते जो मेरे नाम थे

खून के रिश्ते जो मेरे नाम थे, ज़िन्दगी के वास्ते इल्ज़ाम थे, हक़ अदा करते रहे रुसवाई का, अश्क़ मेरे जा-ब-जा बदनाम थे, फासलों की बढ़ गयी रस्सा-कशी, जो तग़ाफ़ुल का लिए पैग़ाम थे, था मुहब्बत का जिन्हें दावा बहुत, मुश्किलों के वक़्त वो नाकाम थे, एक तिनका जो मिला सौग़ात में, कीमती था और उसी के दाम थे, आज उसके नाम से जिंदा हूँ मैं, जिसके छोटे हाथ छोटे ग़ाम थे... उर्मिला माधव... 1.4.2014...

ख़ताएं आपकी हैं

ख़ताएँ आपकी हैं रंज ओ ग़म हमारा है, समझ सकें तो यही ख़ास इक इशारा है. हमें है ख़ब्त यूं ही ग़मज़दा ही रहने का, तुम्हीं बताओ तुम्हें हमने कब पुकारा है? किसी भी वक़्त तुम्हें वक़्त ही नहीं रहता, तुम्हें समझ ही नहीं इसमें जो ख़सारा है.. हमारे पास है परचम फ़क़त बुलंदी का, हमारी उम्र तो ख़ल्वत का इक इदारा है.. हमारी आंख में ठहरा हुआ है इक सागर, मज़ा तो ये है यही ज़ीस्त का सहारा है.. उर्मिला माधव

बहुत देखा जहां जाना–;नज़्म

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, मगर वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , तो ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, उर्मिला माधव

अब कलम से आग लगती ही कहां है

अब कलम से आग लगती ही कहाँ है, आग का मक़सद तो हर इक आशियाँ है, ज़िन्दगी ज़िंदादिली है, सच है क्या ये ? कोई बतलाएगा इसमें क्या निहां है? क्या कोई मज़हब अभी बाक़ी रहा है, क्यों फ़ना होता है जो इक कारवां है? वो भी राही क़त्ल कर डाले गए सब, जिनकी पाकीज़ा ज़ुबाँ, अम्न-ओ-अमां है, इसको किन नज़रों से देखा जाएगा अब? ये जो मक़तल से गया गुज़रा समां है, उर्मिला माधव,

जंगली जंजाल देखो

जंगली, जंजाल देखो, मकड़ियों के, जाल देखो, आदमी का, हाल देखो, लड़कियों के नाम पर, रोज़ इक वबाल देखो, इज़्ज़तों पे क़ाबिज़ हैं, माईयों के लाल देखो, उफ़ अगर जो करनी है, गर्दनें हलाल देखो, हक़ जो कह रहे हैं उनकी खिंच रही है,खाल देखो, उँगलियाँ उठाने को, ख़ुद-ब-ख़ुद बहाल देखो, जो अलिफ़ न सीख पाए, उनका दाल,ज़ाल देखो, रेप,सीना जोरी की, रोज़ एक मिसाल देखो, देश के खिलाड़ियों को, हाय ख़स्ता हाल देखो जीत आईं ओलिम्पिक, उनका इस्तेमाल देखो, उसके आगे क्या होगा, ये है इक सवाल देखो, कुछ न मिलना,जाना है चेहरों पे मलाल देखो, सोचने का काम क्या है, बस यही हर साल देखो, उर्मिला माधव..

आग ग़ैरों ने लगाई

आग ग़ैरों ने लगाई बोलो इसका क्या करें, हार कर बैठें के या फिर हौसला ज़िंदा करें, कोई भी इस ज़िन्दगी में साथ तो देता नहीं, ख़ुद-ब-ख़ुद उठ जाएँ ख़ुद ही रास्ता पूरा करें, ज़िन्दगी कुछ भी नहीं है एक सिवाए हादसा, फिर भी इन हालात से कुछ खूबियां पैदा करें, पाँव के छाले न देखें,ज़िन्दगी रख्खें रवाँ, ये न सोचें किसलिए अब रास्ता नापा करें, कौन है यक़ता यहाँ पर सब के सब हैं एक से, ख़ुद को अदना मान कर क्यूं दिल भला छोटा करें फ़र्ज़ को अंजाम देना है बहुत तरतीब से, हर नफ़स ही कीमती है वक़्त क्या ज़ाया करें.... उर्मिला माधव...

कोई जीता है कोई मरता है

कोई जीता है, कोई मरता है हमपे अब कुछ नहीं गुज़रता है, जाने क्या-क्या न देखा आंखों ने, ज़हन कब आंधियों से डरता है? दिल तो पथ्थर का हो गया कब का, फिर भी रह रह के आह भरता है, अब वही रहनुमा है दुनिया का, जो कि हर दिन गुनाह करता है, उर्मिला माधव

ग़ैर के दिल पर हंसने वाले

गैर के दिल पै हंसने वाले,अपना दिल सहला कर देख, उसमें भी कुछ दाग़ तो होंगे,थोड़ा अन्दर जा कर देख, मिली-जुली कुछ हसरत होंगी, थोड़ी हलकी भारी सी ख़ूब क्या है ,ख़ामी क्या है,ख़ुद आवाज़ लगा कर देख, झूठी बातें और मक्कारी,क़दम-क़दम पर हाज़िर रोज़, कोई कहीं त-आल्लुक़ मत रख,अपना आप जगा कर देख, दर्द बहुत हैं,खुशियाँ कम हैं,हर इक घर में आँखें नम हैं, बरस पड़ेंगी वो सब आँखें, कोई बात चला कर देख, खुद की ख़ातिर जीने वाले,दुनिया में इनसान बहुत, हर दिल में झंकार मिलेगी,टूटा दिल बहला कर देख.....   उर्मिला माधव... 17.9.2014...

तुझसे ऐ दिल

तुझसे ऐ दिल न मगर काम हमारा निकला जो बुलंदी की हवाओं पे उड़े शाम ओ सहर, उनकी तह में भी कोई ख़ास इदारा निकला, हम जो मग़रूर रहे, ख़ुद को जुदा कर लेंगे, तुझसे ऐ दिल न मगर काम हमारा निकला, हमने अहबाब से जब ख़ूब गुज़ारिश करली, इब्ने आदम ही मगर यार सहारा निकला, हम खड़े होके भंवर में ही जलाते थे चराग़, झुक के देखा तो बड़ी पास कनारा निकला, हमको कमरे में बहुत धुंध नजऱ आने लगी, डर के देखा तो कोई आम शरारा निकला, उर्मिला माधव

नज़्म चाय

आज फिर शाम हो गई तुम बिन, आज फिर रोके उठ गई हूं मैं, क्या करूँ काम ये भी बतला दो, इस धुंधलके में कैसे चलना है, ये भी अंदाज़ मुझको समझा दो, सुब्ह जो रोज़ शाम जैसी है, सुब्ह की शक़्ल कैसे पाएगी, दिन भी धुंधला दिखाई देता है, सुब्ह वो क्या कभी न आएगी ? तुम भी जब साथ-साथ उठते थे, कामिनी खिलखिला के हंसती थी, खुशबुएँ,खिड़कियों से आती थीं, पत्तियां फ़र्श पर बिखरती थीं, और हर गुफ़्तगू,सिरे के बिना, ख़त्म होकर भी जो न होती थी, रोज़ तुम मुझको ये बताते थे, चाय अच्छी नहीं सेहत के लिए, मैं मगर मुस्कुरा के उस पल ही, दूसरी चाय लेके आ जाती, और तुम अपने काम करने को, अपने कमरे को छोड़ जाते थे, आज कमरा वहीं पे रहता है, हां मगर मैं वहां नहीं रहती .... उर्मिला माधव, 12.9.2017

हम दिवाने हैं

तुम समझते हो हम दिवाने हैं? हमने दर्द ओ अलम भी जाने हैं, हम ही ख़ामोश रह गए अक्सर, तीर ओ खंजर भी सबने ताने हैं, हमने नींदें हराम कर डालीं सो हमें ख़ाब फिर हमें बनाने हैं, हमको ग़म भी महज़ उसूलन ही, घर की दीवार पर लगाने हैं.. मेरे घर में भी इक असासा है, वो जो गुज़रे थे सब ज़माने हैं  मेरे दिल की ये राज़ दारी बची, अपने अश्कों के कुछ ख़ज़ाने हैं .. उर्मिला माधव  ख़ाब फिर से हमें बनाने हैं 

किसको हासिल कौन है

ढूंढिए इस शह्र में अब किसको हासिल कौन है  और ज़रा बतलाइये किसके मुक़ाबिल कौन है मैंने मीज़ानों से पूछा,ताक़ पर रख कर ज़मीर अपनी इन बर्बादियों में और शामिल कौन है खुद हवाले करके जिसने,कश्तियाँ तूफ़ान में बादबां से जाके पूछा मेरा साहिल कौन है, ये नसीमे ख़ारो ख़स किसने जलाया आग में आबशारों ने ये सोचा ,इतना जाहिल कौन है, बर्फ़ का सीना पिघल कर एक दरिया हो गया, कौन ठहरा था यहाँ पर,इतना माइल कौन है, उर्मिला माधव

नातेदारी मेरी थी

जैसी भी थी नातेदारी मेरी थी, ढोते रहने की लाचारी मेरी थी, मेरे बाद हक़ीक़त जानोगे, अपने घर से हर बेज़ारी मेरी थी, झेल रहे थे लोग ये मैं भी जान गई, सुनते रहने की बेदारी मेरी थी, उर्मिला माधव

अजीब शख़्स है

अजीब शख़्स है बस आईने बनाता है, हर एक आइना अपनी तरफ़ लगाता है, न जाने किस तरह दरया का रुख़ दिखाता है  आईना साज़ हूं वो सबको ये बताता है,