ज़ाहिर है

ज़ाहिर है के दुखी नहीं हो पाती है,
हैरत है क्यूँ आँख नहीं रो पाती है !!

बरस कभी जो जाती है ये आँख अगर,
खुशियों के ही मोती ये बरसाती है,

ज़मीं यहाँ की बहुत-बहुत उपजाऊ है,
मगर ...जह्र के बीज नहीं बो पाती है,

हर मज़हब के लोग यहाँ पर रहते हैं,
मेरे देश की मिट्टी सबको भाती है,

हवा चमन की रंग रंगीली लगती है,
कोयल जब भी मीठे स्वर में गाती है,

पंछी की तो बन्धु कोई भी जाति नहीं,
इनसानों को यही बात बतलाती है,

परदेसी बन दूर देस जो रहते हैं,
उन तक भी ये ख़ास खबर ले जाती है,

जब गाती है कोयल जाकर कानों में,
हर-हर गंगे गीत सुना कर आती है...
उर्मिला माधव...
22.2.2014...

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