बिगड़ जाए

कोई मंज़र नहीं भाता,अगर तबियत उखड जाए,
जो तुर्रम खां भी आ जाए,करेगा क्या,बिगड़ जाए,

ये मेरी ज़िन्दगी अपनी,जिगर अपना,जहाँ अपना,
उज़्र दारी यहाँ किसकी,के मेरी जां पै पड़ जाए ??

हज़ारों गर्दिशें झेलीं,ये जलते दश्त और बस मैं,
उठाले हाथ दुनिया से,जो इस मुद्दे पे अड़ जाए,

उठाया मुंह चले आये, वो मेरी कैफियत सुनने,
कलेजा नोंच कर रख दूँ,कोई जो मुझसे लड़ जाए,

मेरा तुम नाम मत लेना,अगर दामन बचाऊं तो,
जिगर ये ताब रखता है,कि जब चाहे अकड़ जाए....
उर्मिला माधव 

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge