इक दफ़ा तनहा हुए
हम भी अपनी ज़िंदगी में इक दफ़ा तनहा हुए,
बाद उसके जाने क्या-क्या, क़ह्र फ़िर बरपा हुए,
तय किया रोना बिलखना भूलना है अब हमें,
हद हुई जब अश्क अपने जब जा-ब-जा रुसवा हुए,
अब पलट कर देखने का होश ही बाक़ी न था,
अच्छे ख़ासे लफ्ज़ भी हर गाम पर फ़तवा हुए,
शर्म रख के ताक़ पर जब हो गए हम बे लिहाज़,
बस ज़माने भर की ख़ातिर मुफ़्त का शिकवा हुए,
अपनी तबियत पे हमेशा, एक चलन हावी रहा,
सब तमाशा देख कर भी सब्र का हिस्सा हुए,
उर्मिला माधव
15.6.2019
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