कुछ बयानात से

कुछ बयानात से कोई बात कहाँ बनती है,
रूह को देर तक कुछ और खंगाला जाए,

जिस्म सांचे में कई शक़्ल में ढल सकता है,
जिंस-ए-किरदार को कुछ और संभाला जाए,
उर्मिला माधव

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