रंग दिखलाता रहा

वक़्त कितने रंग दिखलाता रहा,
जाने किस-किस शक़्ल में आता रहा,

फिर भी अपनी हिम्मतें सब जोडके,
खुद मेरा दिल ,खुद को समझाता रहा,

गाहे-गाहे,हिल गया मेरा वजूद,
फ़िर भी हंसके ज़र्फ़ दिखलाता रहा,

जान कर ही सब जहां की फितरतें,
दिल फरेब-ए-ज़ीस्त भी खाता रहा, 

एहतियातन कर लिया बस ऐतक़ाफ़,
यक़-ब-यक़ जब हौसला जाता रहा,
#उर्मिला 
11.२.2015

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