मुहब्बत को निभाने में

मुहब्बत को निभाने में न जाने खो गया क्या-क्या,
जुदाई बाद वो जाने के आख़िर ,हो गया क्या-क्या..

जहाँ वाले मिरी तस्वीर का रुख़ देखते भी क्यूँ,
कहाँ ज़ाहिर किया मैंने के मेरा रो गया क्या-क्या ...

जो माज़ी लिख रही थी आज तक भी,ज़िन्दगी मेरी,
कहीं जब आसमां रोया,वो तेरा धो गया क्या-क्या...
उर्मिला माधव..

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