नहीं कर पाते हैं
हम लोगों से बात नहीं कर पाते हैं,
बेमतलब ख़िदमात नहीं कर पाते हैं,
सब दुनियां मग़रूर समझती रहती है,
ज़ाया हम जज़्बात नहीं कर पाते हैं,
भीतर भीतर ज़ख़्म उबलते रहते हैं,
गिरया को बरसात नहीं कर पाते हैं,
जब कोई तूफ़ान उठाया इस दिल ने,
हम आंखों में रात नहीं कर पाते हैं,
जब पहले ही बोझ बहुत सा है सर पर,
उलझन को इफ़रात नहीं कर पाते हैं...
उर्मिला माधव
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