हद में हूं

आजकल दुश्मनों की ज़द में हूँ,
मैं मगर अब भी अपनी हद में हूँ,

इक जो महबूब है वो नाला है,
ज़ुल्म ये है के उसकी रद में हूँ,

उसके सोचे से क्या बिगड़ना है,
जब के हर आह की सनद में हूं,

मैं हूँ महफूज़ उसकी दुनिया में,
कैसे शामिल मआनी बद में हूँ ?

तुझसे छूटी तो घर में हूँ अब मैं,
ज़िन्दगी मैं मिरी लहद में हूँ...
उर्मिला माधव,

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