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Showing posts from November, 2024

इशारा मिल गया

वो नज़र आये ज़रा सा और कलेजा हिल गया, क्या अजब जलवागरी थी लो हमारा दिल गया.... वो ही वो यकता जहां में,कोई भी सानी नहीं  दफ़अतन ही आगये,लेकिन इशारा मिल गया !! उर्मिला माधव .... 27.11.2014

किसलिए सवाली है

दिल भला किसलिए सवाली है, शाम जब रोज़ ढलने वाली है , चाँद भी अब नज़र नहीं आता, दिल भी तनहा है रात काली है, दिन के आने से कुछ नहीं होगा रंग सूरज का भी जलाली है, आँख कैसे सुकून पाए अब, ज़र्रा-ज़र्रा ही बे-जमाली है, उसको बेकार ही समझना बस  जो भी दिल रंजो ग़म से ख़ाली है, ये लो आंखों में खून आ पहुंचा, लाल बारिश भी होने वाली है, हर हकीक़त से सुर्खरू होकर, ख़ास दोज़ख़ में अब बहाली है, उर्मिला माधव... 24.11.2014...

ऊंचे शाइर हो गए

इस जहाँ में जाने कितने ऊंचे शाइर हो गए, उम्र भर गुमनाम थे,फिर मर के ताइर हो गए, अब कलम की धार के मानी कहाँ,बंदानवाज़, दिन चुकाए ज़िन्दगी के मर के ज़ाहिर हो गए, उर्मिला माधव.. 24.11.2016

रात भर सोई नहीं

कल तुम्हारी याद आई,रात भर सोई नहीं, अश्क़ अपना रो रहे थे,मैं मगर रोई नहीं, क्या कहूँ दामन न जाने कैसे गीला हो गया, होश कायम रह गए बस मुख़्तसर खोई नहीं.. उर्मिला माधव.. 24.11.2016

तो कुछ और करें

हम तिरे ग़म से उबर जाएं तो कुछ और करें, तेरे ज़ीने से उतर जाएं तो कुछ और करें, अब ये तक़दीर कहीं और अगर ले जाए, इससे पहले ही जो मर जाएं तो कुछ और करें, अब तो नश्शे में हुए ग़र्क़ हमें होश कहाँ रंगे उल्फ़त से जो डर जाएं तो कुछ और करें, सारी दुनिया से बहुत अच्छा भटक लेते हैं, इस जुनूं में भी जो घर जाएं तो कुछ और करें, अपनी ख़ाहिश है, जहां भर से अलग चलने की, हर मुसीबत से उबर जाएं तो कुछ और करें, उर्मिला माधव

चिंगारी होती है

क्या बतलाएं दुनियादारी कितनी भारी होती है, चाहे जितनी ख़ाक पड़ी हो पर चिंगारी होती है, तुम्हें कहां मालूम रहेगा, दीवारें भी हिलती हैं  हंसती आंखों ने भी रोकर रात गुज़ारी होती है, अपना इक किरदार बनाया हमने अपनी आदत से रहते हैं ख़ामोश सभी जब बात हमारी होती है उर्मिला माधव 

तो कुछ और करें

हम तिरे ग़म से उबर जाएं तो कुछ और करें, तेरे ज़ीने से उतर जाएं तो कुछ और करें, अब ये तक़दीर कहीं और अगर ले जाए, इससे पहले ही जो मर जाएं तो कुछ और करें, अब तो नश्शे में हुए ग़र्क़ हमें होश कहाँ रंगे उल्फ़त से जो डर जाएं तो कुछ और करें, सारी दुनिया से बहुत अच्छा भटक लेते हैं, इस जुनूं में भी जो घर जाएं तो कुछ और करें, अपनी ख़ाहिश है, जहां भर से अलग चलने की, हर मुसीबत से उबर जाएं तो कुछ और करें, उर्मिला माधव

चेहरे पे जो आते हैं जाते हैं

अभी हम होश में होकर भी हैं बेहोश जैसे ही, किसी के टोक देने पर भी केवल मुस्कुराते हैं.. कभी मिलने अगर आओ तो हमको ग़ौर से पढ़ना, हज़ारों दर्द हैं चेहरे पे जो आते हैं, जाते हैं.. उर्मिला माधव

घबरा गए

एक ज़रा सी ...चोट से घबरा गए? हमको देखो हम कहाँ तक आगए , चांदनी हर बाम पै छिटकी रही, हम ही कसदन तीरगी में आगये, जुम्मा-जुम्मा आठ दिन के हो मियाँ, पथ्थरों से किसलिए टकरा गए !!!! देख लो मुड़ने से पहले चार सू, फिर नहीं कहना के तुम चकरा गए, दौड़ते रहते हो बस दीवाना वार वो झटक के ज़ुल्फ़ क्या बिखरा गए उर्मिला माधव

हद में हूं

आजकल दुश्मनों की ज़द में हूँ, मैं मगर अब भी अपनी हद में हूँ, इक जो महबूब है वो नाला है, ज़ुल्म ये है के उसकी रद में हूँ, उसके सोचे से क्या बिगड़ना है, जब के हर आह की सनद में हूं, मैं हूँ महफूज़ उसकी दुनिया में, कैसे शामिल मआनी बद में हूँ ? तुझसे छूटी तो घर में हूँ अब मैं, ज़िन्दगी मैं मिरी लहद में हूँ... उर्मिला माधव,

मुक़ाबिल आगया

जिसको देखो वो मुक़ाबिल आ गया, मुश्किलों पर मेरा भी दिल आ गया, मैंने सोचा हाथ से जाने भी क्यों दूं , इतने नेज़ों बीच बिस्मिल आ गया, इस तखैय्युल में बुराई क्या है बोलो, आँख बस मूंदी के साहिल आ गया,  उर्मिला माधव... 13.11.2014...

अब नहीं बस

दह्र से इतनी मुहब्बत, अब नहीं बस अब नहीं, प्यार की इतनी इबादत, अब नहीं बस अब नहीं..

बक बक करते रहते हैं

क्या जाने क्या बक बक करते रहते हैं, मर जाने की हद तक करते रहते हैं.. लानत भिजवाना भी ज़िम्मेदारी है, जो कुछ भी है, अनथक करते रहते हैं.. इनको इतना वक़्त कहां से मिलता है, जिस्म से ले के मन तक करते रहते हैं.. उर्मिला माधव

दुखों के आकलन फ़्री वर्स

दुखों के आकलन होते नहीं, कौन गिन पाया है, गिरते आंसुओं को? दर्द को किसने हथेली पर रखा है? कौन सोचे क्या है क़ीमत आंसुओं की, आँख की किस्मत  कहाँ लिख्खी है बोलो इस तरह सदियां गुज़ारीं, रोकती हूँ, पोंछती हूँ, रोज़ अपने आंसुओं को, लाल होकर छिल गए हैं गाल मेरे, किन्तु क्या अनुमान है पीड़ा का मुझको ? शून्य में ताका है, पहरों बैठ कर, और स्वयं को दे रही हूँ अब दिलासा, भित्तियों के साथ लग कर बैठ जाऊं, या कि फिर आँगन तेरे चक्कर लगाऊं, खिड़कियों पर हाथ है, सिसकियों का साथ है, रात गहराने लगी, नींद कब देती है बोलो साथ मेरा? ऐसा लगता है कि अंतिम  एक झपकी आएगी, मैं स्वयम में और स्वयम मुझमें रहेगा फिर कहानी को कोई बच्चा कहेगा.... उर्मिला माधव..

कुफ़्र कहते हैं

वो जो चेहरे पै ज़ेब रखते हैं, दिल में ख़ासा फरेब रखते हैं, ऐसी दुनियां को क़ुफ़्र कहते हैं, दिल में हम भी ज़रेब रखते हैं... उर्मिला माधव... 8.11.2014... ज़ेब--- खूबसूरती, ज़रेब---शिकन...

सूरत का सुकूं

सूरत का सुकूं ये नहीं,सीरत का सुकूं है, ये वो ही अदा है के मुझे जिसका जुनूं है, दिल-दिल सा रहे भी तो हो लबरेज़ वफ़ा से, काँटों सा बदन होगा यही इसका खुसूं है, उर्मिला माधव... 8.11.2014...

साथ कब चल पाओगे

तुम हमारी मुश्किलों के साथ कब चल पाओगे, साफ़ कहते हैं के आधी राह पर रुक जाओगे, कौन आख़िर चाहता है,उम्र भर जलता रहे, गर तड़पते देख लोगे,तुम बहुत घबराओगे, ज़ख़्म मत छेड़ो गुज़ारिश कर रहे हैं ऐ मियां, ज़िद अगर कर जाओगे तो बाद में पछताओगे, इक ज़माना हो गया,हम इश्क़ लिखते ही नहीं, हम अगर लिख्खेंगे तुम ही दस तरह बल खाओगे हम भी तो हर चंद ख़ुद को रोकते रहते हैं बस, फिर भी ना माने तो ठंडी आग में जल जाओगे, उर्मिला माधव, 2.11.2017