शिकस्ता जिस्म
शिकस्ता जिस्म लेकर ही जो चलना है तो चल लेंगे,
अगर मुमकिन नहीं होगा तो दुनियाँ से निकल लेंगे,
ज़रुरत क्या हमें सोचें कोई माज़ी ऑ मुस्तकबिल,
दुआ के वास्ते हरगिज़ न हाथों में रहल लेंगे,
क़दम दो चार भी चलना अगर हमको हुआ मुश्किल,
किसी चिकनी सतह पर पाँव रख्खेंगे फिसल लेंगे,
कभी जब ला मकां से लाएगा कासिद तलब नामा,
करेंगे दस्तखत फ़ौरन, कहेंगे क्यूँ कि कल लेंगे,
कहीं ख्वाहिश बची होगी, पलट कर लौट आने की,
किराया ज़िंदगी देकर नया फिर घर बदल लेंगे,
उर्मिला माधव
Comments
Post a Comment