इस क़दर बेज़ार हूँ
ज़िन्दगी की तल्खियों से इस क़दर बेज़ार हूँ,
मारने-मरने की हद तक पुश्त-ओ-पा खूंखार हूँ,
आये महफ़िल में चुकाने,आपसे बाकी हिसाब,
आपको ख़ामा-ख़याली है कि मैं ग़म-ख़्वार हूँ,
वक़्त वो कुछ और था जब घर हमारा था कहीं,
आओ इस्तकबाल है कि अब महज इक दार हूँ,
फैसला करने की नौबत है तो फिर क्या देर है,
हूँ मुक़ाबिल आपके शम्स-ओ-क़मर,तैयार हूँ,
उर्मिला माधव...
2.3.2014..
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