बस दुआ ही चाहती है
मुझपे बस काबिज़ हुआ ही चाहती है,
एक शै जो सिलसिला ही चाहती है,
मैं खरी उतरूं अबस ,उम्मीद पर,
वो मेरा हरदम बुरा ही चाहती है,
मैं कड़े फिकरों से गुजरूँ,रात दिन,
अपने हक में बस दुआ ही चाहती है,
मैं गुज़रती हूँ, हज़ारों तन्ज़ से पर
ज़ख्म दिल के वो छुआ ही चाहती है,
मैंने भी बाज़ी रखी,उस ज़ीस्त पर,
खेलना जो बस जुआ ही चाहती है...
उर्मिला माधव ...
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