क्यों नहीं रहती
मुझको परवाह क्यों नहीं रहती ?
लब पे कोई आह क्यों नहीं रहती?
कोई इज़हार-ए-इश्क़ करता रहे,
दिल में कोई राह क्यों नहीं रहती ?
भाते रहते हैं कितने चेहरे मगर,
कोई भी चाह क्यों नहीं रहती?
अपनी मर्ज़ी से ख़्वाब बुनती हूँ,
हस्ब-ए-इस्लाह क्यों नहीं रहती?
हुस्न-ए-मंज़र से भी मुतास्सिर हूँ,
ज़ेहन में वाह क्यों नहीं रहती ?
सबको है फ़िक्र दीन-ओ-दुनियां की,
मुझको लिल्लाह क्यों नहीं रहती?
उर्मिला माधव,
6.11.2016
Comments
Post a Comment