बीनाई नहीं

आँख है पर क्या करें बीनाई तो पायी नहीं,
बात बढ़के हसरत-ए-दीदार तक आई नहीं,

आँख से परदे हटाके,दिल की जानिब देखले,
इस तरह गर्दन झुकानी क्यूँ तुझे आई नहीं??

तार दामन के बचाता है अबस ही बे खबर,
इश्क़ में दीवाना होना....कोई रुसवाई नहीं,

जो तू मिलना चाहता है,दिलनशीं महबूब से,
सर झुका कुर्बान होजा.....वरना शैदाई नहीं,

है अनल-हक़ देख तो नज़रें घुमा कर चार सू
आज अनहद बज रहा है क्या वो शहनाई नहीं?
उर्मिला माधव...
२१.१०.२०१३.

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