याद सुहानी निकली

रात के ख़्वाब से इक याद सुहानी निकली,
सोचने बैठे तो एक ख़ास निशानी निकली,

ख़ुद को छोड़ा था कहीं प्यास को दरिया करते,
जिस्म लगता था नया,प्यास पुरानी निकली,

माह-ओ-अख़्तर भी अंधेरों के तले सोया किये,
हम तो अहमक ही रहे, रात सयानी निकली,

उसने एक ख़ास बदन देके हमें भेज दिया,
यूँ ही दम भरते रहे, ज़ीस्त भी फ़ानी निकली,

हमने मुश्किल को बहोत पास से देखा, परखा,
वो मगर बन के मिरी आंख से पानी निकली...
उर्मिला माधव

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