बड़ी बेख़बर हूँ

बड़ी बेखबर हूँ, हक़ीक़त बता दूं,
तुझे ज़िन्दगी अब कहाँ से सदा दूँ,

चमकती है बिजली सी ख़ामोशियों में,
अभी मैं भला कैसे घर को सजा दूँ

बहुत उम्र गुज़री अजब तीरगी में,
ये जी चाहता है कि दामन जला दूँ,

यहां मेरा अंदाज़ सब से जुदा है,
तो अंदाज तुझको नई क्या हवा दूँ,

तबीयत भी अंदर से कहने लगी है
जो हैं तीर खंजर वो सारे चला दूँ,

कभी मैंने दिल की सुनी ही कहाँ है,
जहान-ए-ज़ेहन को कहां तक दगा दूँ,
उर्मिला माधव

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