कुछ न था

क्या ज़िक्र हो उस राह का, जहां राह थी और कुछ न था,
क्या ज़िक्र हो उस चाह का जहां चाह थी और कुछ न था,

इक बज़्म थी  और हम भी थे ख़ामोशियों के पंख थे,
क्या ज़िक्र हो उस वाह का जहां वाह थी और कुछ न था,

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