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Showing posts from August, 2023

शबनमी रातों से

शबनमी रातों से दिल घबरा गया, और ज़ेहन पर एक कुहासा छा गया, दूरियां हमने मुक़म्मल कर तो लीं, दम-ब-दम मुंह को कलेजा आ गया, उर्मिला माधव

बड़ी बेख़बर हूँ

बड़ी बेखबर हूँ, हक़ीक़त बता दूं, तुझे ज़िन्दगी अब कहाँ से सदा दूँ, चमकती है बिजली सी ख़ामोशियों में, अभी मैं भला कैसे घर को सजा दूँ बहुत उम्र गुज़री अजब तीरगी में, ये जी चाहता है कि दामन जला दूँ, यहां मेरा अंदाज़ सब से जुदा है, तो अंदाज तुझको नई क्या हवा दूँ, तबीयत भी अंदर से कहने लगी है जो हैं तीर खंजर वो सारे चला दूँ, कभी मैंने दिल की सुनी ही कहाँ है, जहान-ए-ज़ेहन को कहां तक दगा दूँ, उर्मिला माधव

मुद्दआ नहीं आएगा

 है ये मेरा तेरा मुआमला, कोई दूसरा नहीं आएगा, जहां सिर्फ़ दिल का विसाल है, कोई मुद्दआ नहीं आएगा, मुझे कब किसीसे गिला हुआ मेरा घर है ग़म के पड़ोस में मुझे ग़म ने कर दी है इत्तिला, कोई ज़लज़ला नहीं आएगा, उर्मिला माधव

कुछ न था

क्या ज़िक्र हो उस राह का, जहां राह थी और कुछ न था, क्या ज़िक्र हो उस चाह का जहां चाह थी और कुछ न था, इक बज़्म थी  और हम भी थे ख़ामोशियों के पंख थे, क्या ज़िक्र हो उस वाह का जहां वाह थी और कुछ न था,