तस्वीर के रुख़

देखते भी कब तलक तस्वीर के रुख़,
आज़माने पड़ गए, तासीर के रुख़,

हकबका कर देखते ही रह गए,
उसके हाथों से लिखी, तक़दीर के रुख़,

फंस गए हम वहशतों के जाल में,
देखने जब पड़ गए जागीर के रुख़,

हमको थीं अज़ादियों की चाहतें,
जब समझने पड़ गए ज़ंजीर के रुख़,
उर्मिला माधव

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