दिल में हुजूमे ग़म
दिल में हुजूम-ए-ग़म है बयाँ हो तो कैसे हो?
कुल ज़िन्दग़ी का दर्द अयाँ हो तो कैसे हो ?
अब ज़िन्दग़ी में वैसी हसानत नहीं रही
ख़ाली है जब ज़हन ये ग़ुमाँ हो तो कैसे हो?
मुर्दार हो चुके हैं इबादत के वलवले,
ऐसे में कोई रक्स-ए-समाँ हो तो कैसे हो?.....
उर्मिला माधव.
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