असीरी के सबब
इक पतंगा जब मुहब्बत के सबब,
लौ की ज़द में आ गया बस जां ब-लब,
जाने उसके जी में आख़िर क्या रहा,
बस ज़ुबां से रट रहा था रब ही
रब,
रात गहराई तो दिल में डर गया,
अब चले पहुंचेंगे जाने कब के कब?
रौशनी देखी तो चल कर आ गया,
ढूंढता फिरता था जो शहर ए तरब
उर्मिला माधव
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