जहां शाम गुज़री थी हिज्र में

जहां शाम गुज़री थी हिज्र में, वहीं रात आके ठहर गई,
भला हश्र इसका रहेगा क्या, जो उधेड़बुन में सहर गई,

यहां पथ्थरों के मज़ार हैं, यही आशिक़ों के वक़ार हैं,
नहीं कोई अहले दयार हैं, हद-ए-राह तक तो नज़र गई,

न तो बेमिसाल है ज़िन्दगी, न कमाल इसमें कहीं कोई,
कहीं मौत ने जो पकड़ लिया तो ये लौट के भी न घर गई..

मिरी ज़िन्दगानी का तर्जुमा, न हुआ न कोई समझ सका,
रहे आम पर ये चली मगर रहे आम से भी गुज़र गई..

कहीं इसमें रंगे जमाल है, कहीं आबरू पे ज़वाल है,
कभी ख़ाहिशों के दयार में न ये चाहती थी, मगर गई,
उर्मिला माधव

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