निकल तो रही हूँ मैं

देहल से अपने घर की निकल तो रही हूँ मैं,
शाना- ब-शाना आपके चल तो रही हूँ मैं,

शमशीर-ओ-तीर लेके भला क्या करोगे तुम?
तंज़-ओ-गुरूर देख के जल तो रही हूँ मैं,

बज़्म-ए-जहाँ में आई हूँ पर बेख़बर् नही,
अपने ही ग़म में रोके संभल तो रही हूँ मैं,

अब तज़किरा करूँ भी किसी ग़ैर पै तो क्यों,
आब-ओ-हवा के सांचे में ढल तो रही हूँ मैं,

मेरी मुख़ालफ़त में हवा तक खिलाफ है,
बे-फ़िक़्र होक फिर भी टहल तो रही हूँ मैं...
#उर्मिलामाधव...
16.6.2015

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