उधार करते हैं

ग़ज़ल ------
ज़ख्म-ए-दुनियां का ग़म छुपाने को वक्ती लम्हा उधार करते हैं, 
जिससे तक़लीफ दिल को होती है,वो ही हम बार-बार करते हैं....

सबको मालूम है ये ग़म क्या है,ऐसे रस्ते का पेच-ओ-ख़म क्या है,
दर्द-ए-दिल क्या है,क्या है ख़ामोशी फिर भी सब प्यार-प्यार करते हैं,

जाने कैसी ये अब रिवायत है,बस मुहब्बत ही इनकी आयत है,
क़ैस-ओ-लैला की तर्जुमानी बन,अपने दामन को तार करते हैं,

कुछ ही लम्हों की ज़िंदगानी है,सब ही वाक़िफ़ हैं के ये फ़ानी है,
झूठे लम्हों की ख़ैर ख़्वाही में अपनी इज्ज़त को ख़्वार करते हैं,

हर मुहब्बत को सिर्फ हामी है,ये ही इंसानी दिल की ख़ामी है,
अच्छी ख़ासी हसीन दुनिया को अपनी तबियत से दार करते हैं....
उर्मिला माधव....
12.6.2017

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge