न घर था हमारा

न घर था हमारा न दुनियां हमारी,
हक़ीक़त यही है के हम थे भिखारी,

बड़ी हसरतों से इमारत बनाई,
रही ज़िन्दगी भर बहुत मारा-मारी,

मकां होंगे लेकिन मकीं ही न होंगे,
रहेगी मुसलसल ही मर्दम शुमारी,

नहीं सल्तनत और न सुलतान होंगे,
पड़े सबको जाना यहाँ बारी-बारी,

हवा में ही उड़ते थे मग़रूर होकर,
लो मरते ही मैय्यत हुई भारी-भारी,

हुई जीत हासिल जिन्हें ज़िन्दगी भर,
मगर मौत से ज़िन्दगी उन की हारी,

ये ताज-ओ-क़ुतुब सब यही पर खड़े हैं
फ़ना होगई बादशाहत बेचारी,
उर्मिला माधव

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