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Showing posts from May, 2022

कहा करे कोई

Ghalib ki zamin par ek koshish.. kis-se kya-kya kaha kare koii yun hi kab tak jalaa kare koii, zindagi bhar kii ye musiibat hai, Gham se kab tak maraa kare koi, kab kahan pe ye saans ruk jaaye  itna kab tak daraa kare koii, gar ye himmat jawaab de jaaye, aisii haalat main kya kare koii, apni jaanib se bas nibaah rahe, chaahe jitnaa daghaa kare koii , waqt bhii waqt par badalna hai, sabr kuchh to zaraa kare koii, aashiqii ishq ek fajiihat hai, khud ko kyun mubtila kare koii, उर्मिला माधव Urmila Madhav

टुकड़ा टुकड़ा

टुकड़ा-टुकड़ा हयात कौन करे इश्क़ से दो  दो हाथ कौन  करे प्यार करना था करके देख लिया फिर   नई   वारदात   कौन  करे जब कि ये तयशुदा है मरना है फिर कोई हासिलात कौन करे सोना जगना भी ग़ैर के हाथों रोज़ यूं ग़म की रात कौन करे #उर्मिला_माधव

नज़्म छोटी सी

एक ज़ीना कोई जन्नत का रहे, कितने सारे लोग नीचे आएंगे, किसको होगी ताब इतना देखने की, कौन कब बिछड़ा हुआ, मिल जाएगा, दुनिया वाले, कहते हैं पागल हमें, हम तलब ज़ीने की छोड़ेंगे नहीं, उर्मिला माधव

राह में

एक दिन मुझको मिला था राह में  जिसको मैने रख लिया था चाह में, दिल शिकन है मुझको ये अहसास था, कुछ नज़र की ही नहीं आगाह में, मुस्कुराना रफ़्त में रख्खा ज़रूर, ग़म तो ज़ाहिर हो गया इक आह में, ख़ाब पर अब मुनहसिर है ज़िन्दगी, हम कहाँ शामिल हुए उस ब्याह में, उर्मिला माधव

न घर था हमारा

न घर था हमारा न दुनियां हमारी, हक़ीक़त यही है के हम थे भिखारी, बड़ी हसरतों से इमारत बनाई, रही ज़िन्दगी भर बहुत मारा-मारी, मकां होंगे लेकिन मकीं ही न होंगे, रहेगी मुसलसल ही मर्दम शुमारी, नहीं सल्तनत और न सुलतान होंगे, पड़े सबको जाना यहाँ बारी-बारी, हवा में ही उड़ते थे मग़रूर होकर, लो मरते ही मैय्यत हुई भारी-भारी, हुई जीत हासिल जिन्हें ज़िन्दगी भर, मगर मौत से ज़िन्दगी उन की हारी, ये ताज-ओ-क़ुतुब सब यही पर खड़े हैं फ़ना होगई बादशाहत बेचारी, उर्मिला माधव