ख़ुश्क आंखों में जब नमी न रही

ख़ुश्क आंखों में जब नमी न रही,
ज़िन्दगी फ़िर ये ज़िन्दगी न रही,

जब बड़े हादसों की ज़द में रहे,
ज़ब्त की फ़िर कहीं कमी न रही,

हमको तनहाई ने संभाला बहुत,
तीरगी तुझ से बरहमी न रही,

खिड़कियां धुल गईं जो बारिश में,
गर्द  फ़िर देर तक जमी न रही...
उर्मिला माधव,
30.4.2018

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