संभलना सीख गए
रोते रोते संभलना सीख गए,
अपने पैरों पे चलना सीख गए,
हम तो पर्दे के पीछे रहते थे,
घर से बाहर निकलना सीख गए,
अब तो सूरज की तरहा चलते हैं,
शाम होते ही ढलना सीख गए,
शिकवा ग़ैरों से क्यों करें आख़िर,
अपनी राहें बदलना सीख गए,
अब पहाड़ों की बर्फ़ जैसे हम,
धीरे धीरे पिघलना सीख गए,
उर्मिला माधव
9.11.2017
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