जहां हूं मैं

सब ये कहते हैं, बे अमां हूँ मैं,
फ़िर भी महफूज़ हूँ,जहां हूँ मैं,

ख़ुद को ज़ाहिर नहीं किया मैंने,
दुनियां कहती है इक ज़बाँ हूँ मैं,

न तो पर्दों का इस्तेमाल किया,
और न सोचा के कब कहां हूँ मैं,

मेरी नज़दीकियां हुईं महसूस,
क्योंकि हर दिल के दरम्यां हूँ मैं,

फिर भी इल्ज़ाम हो तो हाज़िर हूँ,
अपने घर के सिवा कहां हूँ मैं?

मेरा दुश्मन नहीं कोई अब तक,
क्यूंकि हर शय पे ही अयाँ हूँ मैं,

नक्श पा मिट गए ये फ़िक़्र नहीं,
तनहा तनहा भी कारवां हूँ मैं....
उर्मिला माधव

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