न ये बाक़ी न वो बाक़ी
न ये बाक़ी, न वो बाक़ी, कोई जल्वा नहीं बाक़ी,
वो हमको याद आते हैं के जो ज़िंदा नहीं बाक़ी..
ज़मीं पे पांव रखने का, किसीको होश तब आया,
के जब दुनिया-ए-फ़ानी में कोई रुतबा नहीं बाक़ी..
ख़ुदी महफूज़ रखने को सिपहसालार क्या रखना,
उठा ले हाथ दुनियां से तो कुछ किस्सा नहीं बाक़ी..
ग़रज़ क्या आख़री हिचकी पे वो रोया, नहीं रोया,
किसी की बेरुख़ी से जब कोई शिकवा नहीं बाक़ी..
उर्मिला माधव,
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