लड़कपन की दुनियां

बुरी हो या अच्छी,लड़कपन की दुनियां,
बहोत याद आती है,बचपन की दुनियां,

वो खड़िया से आँगन में ख़ाने बनाना,
ऑ गिट्टी से उस पर निशाने लगाना,
बस एक पाँव से ही मगर चलके जाना,
कभी जीत जाना,कभी रो के आना,

नहीं फ़िक़्र कोई,फ़क़त मन की दुनियां,
बहोत याद आती है बचपन की दुनियां,

वो अम्मा की साड़ी से गुड़िया बनाई
ऑ गुड़िया के माथे पै बिंदिया लगाई
जमा करके .....चूड़ी के टूटे से टुकड़े
बहुत हसरतों से वो ...गुड़िया सजाई

वो गुड़िया के चूल्हे ऑ बरतन की दुनियां
बहोत याद आती है बचपन की दुनियां..

सभी अपने लगते,गली,घर ऑ आँगन,
कोई ख़ान मामा.....कोई चाचा जुम्मन,
सभी एक से थे,.....मुसलमां, बिरहमन,
जो बच्चों का रखते,हरिक हाल में मन,

ग़ज़ब थी निराली वो ठनगन की दुनियां,
बहोत याद आती है बचपन की दुनियां,

वो ऊंची सी दीवार,ईंटों की गलियां,
जहाँ मिलके खेले कभी गुइयाँ-गुइयाँ
वो मीरा,वो मृदुला,बड़ी मालती थी,
मगर मुझको प्यारी थी बहना की बहियाँ

न देखी कभी फ़िक़्र-ओ-उलझन की दुनिया
बहोत याद आती है बचपन की दुनियां...
उर्मिला माधव..

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