बुलंदियों को सज़ा
कब से बुलंदियों को सज़ा दे रही हूं मैं,
दिल को ग़लत जगह का पता दे रही हूँ मैं,
सेहरा से रेत लेके,बनाया है पैराहन,
तूफां को बिजलियों को सदा दे रही हूं मैं,
दरकार ही नहीं है मुझे कोई ग़म गुसार,
अब ख़ुद ही रहगुज़र को दगा दे रही हूँ मैं,
चलती रही हूं कब से अबस रंज ओ गम के साथ,
अफ़सुर्दगी में ग़म को हवा दे रही हूं मैं,
ऐ ज़िन्दगी मैं तेरे तईं, सोचती हूँ अब,
किस बदगुमां को अपनी वफ़ा दे रही हूं मैं,
उर्मिला माधव..
20.5.2017
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