क्या करें
ज़ब्त के कुछ दायरे हैं, इसके आगे क्या करें,
भीड़ से उठ जाएं जा कर रूह को तनहा करें,
रोज़ उठ कर सोचते हैं, क्या ख़राबी हम में है,
दिल के दरवाज़े को खोलें देर तक झांका करें,
कुछ नुमायां हो न पाए, फ़िक्र इसकी है हमें,
पर ज़ियादा बोझ है तो किस तरह आधा करें,
हर मरासिम किस क़दर तनक़ीद करता है मिरी,
कौन है ग़मख़्वार किस से दर्द हम साझा करें,
ज़ीस्त की अठखेलियों से ज़िन्दगी आज़िज़ हुई,
रोज़ ही मर जाएं ख़ुद को रोज़ ही पैदा करें..
उर्मिला माधव
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