नज़्म
एक छोटी सी नज़्म ...
यही तो बात है सईयो, ...हमें झुकना नहीं आता,
अगर हम सर झुकाते तो हमारी जां निकल जाती,
तो फिर जीने के क्या मानी, कहानी ही बदल जाती,
हमें तसलीम करने का .......सलीक़ा ही नहीं आया,
अगर आता तो हर मुमकिन, तबीयत भी संभल जाती,
उर्मिला माधव
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