घर को नहीं गए

टूटे हुए थे ऐसे के घर को नहीं गए,
सब सोचने लगे थे के मर तो नहीं गए..

हम खुशनसीब इतने रहे, सोचते हैं अब,
गिरते हुए फ़लक से भी पर तो नहीं गए..

रुख़सत के वक़्त भीड़ किसी काम की न थी,
जो भी पुराने ज़ख़्म थे भर तो नहीं गए..

हालात का उरूज था, किस्मत प था ज़वाल,
उलझन में हम खड़े थे मगर रो नहीं गए..

दीवानावार हमने सहा, ज़ीस्त का मिज़ाज,
जागे भी, रूबरू भी रहे, सो नहीं गए..

अफ़सुरदा ज़िन्दगी थी, मगर कुछ नहीं कहा,
मुश्किल थी रहगुज़र भी मगर खो नहीं गए..

जब हमने ज़िन्दगी से कहा, तू नहीं अज़ीज़,
पूछा गया था हम से के डर तो नहीं गए ??
उर्मिला माधव

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