नहीं चाहिए

प्यार का मुझको मेरे, इनआम भी नईं चाहिए,
हां मगर झूटा कोई इलज़ाम भी नईं चाहिए।

ज़िन्दगी चुक ही गई अब राह में चलते हुए,
नाम चाहे हो न हो, बदनाम भी नईं चाहिए।

वो कभी इक वक़्त था जब मुन्तज़िर थे शाम के,
ज़िन्दगी के वास्ते अब शाम भी नईं चाहिए।

हर क़दम इक मौत का जलवा दिखाया ज़ीस्त ने,
रब की जानिब से कोई पैग़ाम भी नईं चाहिए।

बिल यक़ी ज़ाया ही होनी है, हर इक पल ज़िन्दगी,
ऐसी दुनिया में हमें कोई काम भी नईं चाहिए।।
उर्मिला माधव

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