Posts

Showing posts from January, 2021

तुझको ईमां की कसम

Tujhko iimaan ki qasam,saahib-e-iimaan to ho, Or kuchh ho ke na ho,haq se musalman to ho :: तुझको ईमां की क़सम,साहिब-ए-ईमान तो हो, और कुछ हो के न हो,हक़ से मुसलमान तो हो, :: Mera daawaa hai asar baat se hota hai zuruur, Or kuchh ho ke na ho,dil se suleman to ho :: मेरा दावा है असर बात से होता है ज़ुरूर और कुछ हो के न हो,दिल से सुलेमान तो हो :: Daayre khul ke bikhar jaate hain,chalne ke liye, Or kuchh ho ke na ho,jazba-e-toofan to ho, :: दायरे खुल के बिखर जाते हैं चलने के लिए और कुछ हो के न हो,जज़्बए-तूफ़ान तो हो, :: Tere kirdar se gar,koii gunah ban jaaye, Or kuchh ho ke na ho,jhuk ke pashemaan to ho, :: तेरे किरदार से गर, कोई गुनह बन जाए, और कुछ हो के न हो,झुक के पशेमान तो हो, उर्मिला माधव,

छोड़ दे

फिल्बदीह के तह्त कही गई ग़ज़ल---- तीर अब दिल पर चलाना छोड़ दे  अपनी खातिर एक ख़ाना छोड़ दे, मैक़दों में आना जाना भूल कर, हंस ज़रा दिल का जलाना छोड़ दे, क्यूँ रहे खुशियों से यूँ महरूम तू, होश में आ लड़खड़ाना छोड़ दे, ग़म है अव्वल,ज़िन्दगी की राह में, इसलिए ख़ुद को सताना छोड़ दे, एक तू क्या हर कोई हलकान है, मान भी जा अब बहाना छोड़ दे, चश्म-ए-गिरयाँ ऑ कलेजा तर-ब-तर, चाक़ दामन ,सब गिनाना छोड़ दे, ग़म ग़लत कर जा कहीं तन्हाई में, जा-ब-जा,ग़म का सुनाना छोड़ दे, ग़र तुझे रोना ही है,जी भर के रो, ऐसा कर शम्मा जलाना छोड़ दे, या के फिर तू बात मेरी मान ले, मुफ्त के सदमे उठाना छोड़ दे... उर्मिला माधव... 27.1.2016

ख़ाब के नीचे

लोग कहते हैं इन्क़लाब के नीचे, हम यहां सोए हैं अपने ख़ाब नीचे,

ग़ज़ब

आप भी बातों में आते हैं, ग़ज़ब, और दिलों में फ़र्क़ लाते हैं, ग़ज़ब. ज़ुल्म करते हैं मुसलसल आप भी, और उस पर मुस्कुराते हैं, ग़ज़ब.. उर्मिला माधव

कोई क्या करे

दिलजले महबूब की बांहों का कोई क्या करे??  ख़ार से लिपटी हुयी राहों का कोई क्या करे?? एक हसरत के लिए..दुनियां नज़र अंदाज़ हो,  इस क़दर बहकी हुयी चाहों का कोई क्या करे?? ग़र्क़ हो ऐसी मुहब्बत छीनले जो मुस्कराहट,  बर्फ होती,सर्द सी....आहों का कोई क्या करे, जो वफ़ा के नाम पर.....सूली चढा दे दार पर,  उस अहद के बदगुमां,शाहों का कोई क्या करे?? कर दिए ज़ंजीर जिसने....ज़िन्दगी के रास्ते,  फिर भला ऐसी सिपह्गाहों का कोई क्या करे??  उर्मिला माधव.. 23.1.2015

किताबें सरहाने रख रही हूँ

ग़ज़ल ------ मैं किताबें अब सरहाने रख रही हूं, चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं, हर वरक संजीदगी के नाम है, एक माज़ी सोलह आने रख रही हूं, इक तजुर्बों का पुलिंदा,हर नफ़स, ज़िन्दगी के ताने-बाने रख रही हूँ, कुछ अंधेरे और दिए बुझने की राख़ और धुंए के कुछ ख़ज़ाने रख रही हूँ, गोकि एहसास-ए-घुटन हलका न हो, बंद करके,कुछ दहाने रख रही हूं,  जिस की दम पे दिन गिने हैं उम्र भर, अपनी तस्वीही के दाने रख रही हूँ, एक खनक आहों के हिस्से की भी है, सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं, उर्मिला माधव, 28.10.2017

कलम किया जाए

उसका सर भी कलम किया जाए, जिसको रह-रह के ग़म दिया जाए, ग़र तगाफुल में रंग भरना हो,  सिर्फ़ गर्दन को ख़म किया जाये, जीते जी ख़ुद को मारना हो अगर, उस पे चर्चा भी कम किया जाए, मुनहसिर मुझ पे घर की दुनिया है कैसे आंखों को नम किया जाए, उर्मिला माधव...

डर तो नहीं गए

टूटे हुए थे ऐसे के घर को नहीं गए, सब सोचने लगे थे के मर तो नहीं गए.. हम खुशनसीब इतने रहे, सोचते हैं अब, गिरते हुए फ़लक से भी पर तो नहीं गए.. रुख़सत के वक़्त भीड़ किसी काम की न थी, जो भी पुराने ज़ख़्म थे भर तो नहीं गए.. हालात का उरूज था, किस्मत प था ज़वाल, उलझन में हम खड़े थे मगर रो नहीं गए.. दीवानावार हमने सहा, ज़ीस्त का मिज़ाज, जागे भी, रूबरू भी रहे, सो नहीं गए.. अफ़सुरदा ज़िन्दगी थी, मगर कुछ नहीं कहा, मुश्किल थी रहगुज़र भी मगर खो नहीं गए.. जब हमने ज़िन्दगी से कहा, तू नहीं अज़ीज़, पूछा गया था हम से के डर तो नहीं गए ?? उर्मिला माधव

घर को नहीं गए

टूटे हुए थे ऐसे के घर को नहीं गए, सब सोचने लगे थे के मर तो नहीं गए.. हम खुशनसीब इतने रहे, सोचते हैं अब, गिरते हुए फ़लक से भी पर तो नहीं गए.. रुख़सत के वक़्त भीड़ किसी काम की न थी, जो भी पुराने ज़ख़्म थे भर तो नहीं गए.. हालात का उरूज था, किस्मत प था ज़वाल, उलझन में हम खड़े थे मगर रो नहीं गए.. दीवानावार हमने सहा, ज़ीस्त का मिज़ाज, जागे भी, रूबरू भी रहे, सो नहीं गए.. अफ़सुरदा ज़िन्दगी थी, मगर कुछ नहीं कहा, मुश्किल थी रहगुज़र भी मगर खो नहीं गए.. जब हमने ज़िन्दगी से कहा, तू नहीं अज़ीज़, पूछा गया था हम से के डर तो नहीं गए ?? उर्मिला माधव

तू भी नहीं

Main agar mazboot hoon murdaar to tu bhi nahin, Raasta roke mera wo haar to too bhi nahin, Barq aaii thi kabhi girne, dabishtaaN ki taraf, Maine hans ke kah diya, gulzaar to tu bhi nahin, Khud ba khud to jal rahi hai,tu sarapa aag hai, Ghar jala kar hans saki,har baar to tu bhi nahin, Muddaton se jal rahe hain ham to sehra ki tarah, Par samandar saA kahin kirdar to tu bhi nahin BewafaiI ka abas,ilzaam kyun mere taiiN, Saahib-e-kirdaar saa gham khwaar to tu bhi nahin, ZindagI ko jaa-b-jaa ruswa kare hai kisliye, Sach yahi hai ke bahut , bezaar to tu bhi nahin.... Urmila Madhav..

एक तरफ़

है तेरी ख़ुदाई एक तरफ़,लैला का भाई एक तरफ़, तू ख़ास ख़ुदा, जा मान लिया,पर हम हरजाई एक तरफ़, हम सब पे दुनिया हंसती है,अब हरि परसाई एक तरफ़, हम हाथ मिला कर पाटेंगे,मज़हब की खाई एक तरफ़, अपनी बारात तो निकलेगी,ग़म से कुड़माई एक तरफ़, हम रोज़ हिसाबां करते हैं, सब पाई-पाई एक तरफ़, जो तुमने हमको बख़्शी है,दामन की काई एक तरफ़, हम सब हरजाई एक तरफ़,जा तेरी ख़ुदाई एक तरफ़, जा तेरी ख़ुदाई एक तरफ़.. उर्मिला माधव

कभी मेरी गली आना

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, और हाँ वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , के ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, कभी मेरी गली आना..... #उर्मिलामाधव... 9.1.2016

नहीं चाहिए

प्यार का मुझको मेरे, इनआम भी नईं चाहिए, हां मगर झूटा कोई इलज़ाम भी नईं चाहिए। ज़िन्दगी चुक ही गई अब राह में चलते हुए, नाम चाहे हो न हो, बदनाम भी नईं चाहिए। वो कभी इक वक़्त था जब मुन्तज़िर थे शाम के, ज़िन्दगी के वास्ते अब शाम भी नईं चाहिए। हर क़दम इक मौत का जलवा दिखाया ज़ीस्त ने, रब की जानिब से कोई पैग़ाम भी नईं चाहिए। बिल यक़ी ज़ाया ही होनी है, हर इक पल ज़िन्दगी, ऐसी दुनिया में हमें कोई काम भी नईं चाहिए।। उर्मिला माधव