झाइयां

आँख के नीचे की काली झाइयां,
और सारी उम्र की तन्हाईयाँ 

घेरती हैं अब सवालों से मुझे,
आज गुज़रे वक़्त की परछाईयाँ,

यूँ भी कहते ही नहीं बनता है कुछ, 
जब ये मुझमें खोजें हैं रानाईयाँ,

जो भी गुज़रा हो मगर इतना रहा,
ज़िन्दगी ने नाप लीं गहराइयाँ ,

पाँव तो हर दम ज़मीं पर ही रहे 
चश्म-ए-नम से देख लीं ऊँचाइयाँ,

दिल मेरा अनहद कहीं सुनता रहा 
दूर कुछ बजती रहीं शहनाइयां ,
उर्मिला माधव

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