नज़्म हवेली
ग़ज़ब खूबसूरत थी अपनी हवेली,
इसी में छुपी है हमारी सहेली,
कभी इसकी ख्वाहिश हवाओं में उड़ना,
दरख्तों की शाखों पै चढ़ना उतरना,
हवाओं की सरगम पे गाना ठुमकना
ऑ नदिया की हलचल पे जी भर मचलना
इरादों से नापें ज़मीं आसमां सब,
किसी एक पल में, न जाने कहाँ कब?
ये ऐसी सहेली है थकती नहीं है,
बहुत मुश्किलों में भी रुकती नहीं है,
उर्मिला माधव
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